ये गजरे तारों वाले
इस सोते संसार बीच,
         जग कर सज कर रजनी बाले!
कहाँ बेचने ले जाती हो,
         ये गजरे तारों वाले?
मोल करेगा कौन,
         सो रही हैं उत्सुक आँखें सारी।
मत कुम्हलाने दो,
         सूनेपन में अपनी निधियाँ न्यारी॥
निर्झर के निर्मल जल में,
         ये गजरे हिला हिला धोना।
लहर हहर कर यदि चूमे तो,
         किंचित् विचलित मत होना॥
होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित,
         लहरों ही में लहराना।
'लो मेरे तारों के गजरे'
         निर्झर-स्वर में यह गाना॥
यदि प्रभात तक कोई आकर,
         तुम से हाय! न मोल करे।
तो फूलों पर ओस-रूप में
         बिखरा देना सब गजरे॥
- रामकुमार वर्मा
काव्यपाठ: वाणी मुरारका

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रामकुमार वर्मा
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 आत्म-समर्पण
 ये गजरे तारों वाले
इस महीने :
'किसके संग गाए थे'
मिलाप दूगड़


रात यदि श्याम नहीं आए थे
मैंने इतने गीत सुहाने किसके संग गाए थे?

गूँज रहा अब भी वंशी स्वर,
मुख-सम्मुख उड़ता पीताम्बर।
किसने फिर ये रास मनोहर
वन में रचवाये थे?

शंका क्यों रहने दें मन में
चल कर सखि देखें मधुवन में
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
वो खुशी जो कहीं नहीं हासिल।
जो मुअस्सर* नहीं ज़माने में।
ख़्वाबगाहों* से चल के आएगी
ख़ुदबख़ुद तेरे आशियाने में।

~ विनोद तिवारी

*मुअस्सर: प्राप्त करने योग्य; ख्वाबगाहों - सपनों की जगह;

संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" में कविताओं के बीच बीच कई मुक्तक भी हैं, जैसे कि यह

तोड़ दो सीमा क्षितिज की,
गगन का विस्तार ले लो


विनोद तिवारी की कविता "प्यार का उपहार" का वीडियो। उपहार उनका और वीडियो द्वारा उपहार का सम्प्रेषण भी वह ही कर रहे हैं। सरल श्रृंगार रस और अभिसार में भीगा, फिर भी प्यार का उपहार ऐसा जो व्यापक होने को प्रेरित करे।

प्यार का उपहार
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