सखी, इन नैनन तें घन हारे
सखी, इन नैनन तें घन हारे ।
बिन ही रितु बरसत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे ॥
ऊरध स्वाँस समीर तेज अति, सुख अनेक द्रुम डारे ।
दिसिन्ह सदन करि बसे बचन-खग, दुख पावस के मारे ॥
सुमिरि-सुमिरि गरजत जल छाँड़त, अंसु सलिल के धारे ॥
बूड़त ब्रजहिं 'सूर' को राखै, बिनु गिरिवरधर प्यारे ॥
- सूरदास
Ref: Swantah Sukhaaya
Pub: National Publishing House, 23 Dariyagunj, New Delhi - 110002

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सूरदास
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इस महीने
'विस्मृति की लहरें'
भवानीप्रसाद मिश्र


विस्मृति की लहरें
ऊँची उठ रही हैं
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बाढ़ पर है अब

ढह रही हैं मन से घटनाएँ
छोटी-बडी यादें और चेहरे
..

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शुक्रवार 2019-06-21 को

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