होली की शाम
होली की शाम सड़कें वीरान
जैसे गुज़र गया हो कारवाँ
छोड़ गया कुछ अपनी निशानियाँ --
बिखरे हुए रंग, फूटे गुब्बारे,
बिछे हुए पीपल के पत्ते,
डाल से टूटे चम्पा के फूल...
इक्का-दुक्का किशोरों की टोलियाँ,
लौटती घरों को,
रंगे हुए कपड़े और पुते हुए चेहरे
बयाँ कर रहे हैं ये दास्ताँ --
अभी अभी गुज़र गया यहाँ से
रँगों का एक कारवाँ
- गीता मल्होत्रा
Geeta Malhotra
Email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 18 Mar 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 22 Mar 2019

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गीता मल्होत्रा
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यूँ तो काव्यालय 22 वर्षों का जवान है किन्तु पिछले वर्ष ही हमने काव्यालय की पहली वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। काव्यालय हमारा व्यक्तिगत गैर-लाभकारी उद्यम है, किन्तु काव्यालय सिर्फ़ हमारा नहीं है। आपका भी है। आप ही से है। तो इस रिपोर्ट के द्वारा आपके संग काव्यालय के परदे के पीछे की कुछ झलकियाँ साझा करना हमारा हर्ष भी है और कर्तव्य भी।

काव्यालय में जून 2018 से जून 2019 के बीच कविता ने अपने कवियों, पाठकों, सहयोगीयों के संग कैसे जिया? रचनाओं का स्रोत क्या रहा, कितने लोग काव्यालय पढ़ते हैं, आपसे प्राप्त सहयोग और काव्यालय का इस साल का खर्च – यह सब साझा करने के पहले एक सवाल जो अक्सर हमें पूछा जाता है, “काव्यालय पर रचना प्रकाशन की क्या प्रक्रिया है?” उसका उत्तर दे दें, और 8 वर्षों से चला आ रहा एक प्यारा ग्रुप, काव्यालय कुटुम्ब, के विषय में बता दें। ..

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