नियति
रात की दस्तक दरवाज़े पर है
आज का दिन भी बीत गया है
कितना था उजाला फिर भी फिर से
अन्धियारा ही जीत गया है
एकान्त की चादर ओढ़ कर फिर से
मैं खुद में खोया जाता हूँ
आँखों के सामने यादों के रथ पर
मेरा ही अतीत गया है
सन्नाटों के गुन्जन में दबकर
अपनी ही आवाज़ नहीं आती मुझको
आँखों की सरहद पर लड़ता
आँसू भी अब जीत गया है
टूटे दर्पण के सामने बैठकर
मैं स्वयं को खोज रहा हूँ
यूँ ही बैठे बैठे जाने
कितना अरसा बीत गया है ... ॥
- अरिफ खान
Arif Khan
email: arif dot khan at sbi dot
Arif Khan
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अरिफ खान
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इस महीने

'काव्यालय के आँकड़े - जून 2018 से जून 2019'


यूँ तो काव्यालय 22 वर्षों का जवान है किन्तु पिछले वर्ष ही हमने काव्यालय की पहली वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। काव्यालय हमारा व्यक्तिगत गैर-लाभकारी उद्यम है, किन्तु काव्यालय सिर्फ़ हमारा नहीं है। आपका भी है। आप ही से है। तो इस रिपोर्ट के द्वारा आपके संग काव्यालय के परदे के पीछे की कुछ झलकियाँ साझा करना हमारा हर्ष भी है और कर्तव्य भी।

काव्यालय में जून 2018 से जून 2019 के बीच कविता ने अपने कवियों, पाठकों, सहयोगीयों के संग कैसे जिया? रचनाओं का स्रोत क्या रहा, कितने लोग काव्यालय पढ़ते हैं, आपसे प्राप्त सहयोग और काव्यालय का इस साल का खर्च – यह सब साझा करने के पहले एक सवाल जो अक्सर हमें पूछा जाता है, “काव्यालय पर रचना प्रकाशन की क्या प्रक्रिया है?” उसका उत्तर दे दें, और 8 वर्षों से चला आ रहा एक प्यारा ग्रुप, काव्यालय कुटुम्ब, के विषय में बता दें। ..

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शुक्रवार 23 अगस्त को

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