अप्रतिम कविताएँ
किधौं मुख कमल ये
किधौं मुख कमल ये कमला की ज्योति होति,
किधौं चारु मुख चंद चंदिका चुराई है।
किधौं मृग लोचनि मरीचिका मरीचि किधौं,
रूप की रुचिर रुचि सुचि सों दुराई है॥
सौरभ की सोभा की दसन घन दामिनि की,
'केसव' चतुर चित ही की चतुराई है।
ऐरी गोरी भोरी तेरी थोरी-थोरी हाँसी मेरे,
मोहन की मोहिनी की गिरा की गुराई है॥
- केशवदास
विषय:
शृंगार (4)

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कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
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नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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