अप्रतिम कविताएँ
साँझ फागुन की
फिर कहीं मधुमास की पदचाप सुन,
डाल मेंहदी की लजीली हो गई।

       दूर तक अमराइयों, वनवीथियों में
       लगी संदल हवा चुपके पाँव रखने,
       रात-दिन फिर कान आहट पर लगाए
       लगा महुआ गंध की बोली परखने

दिवस मादक होश खोए लग रहे,
साँझ फागुन की नशीली हो गई।

       हँसी शाखों पर कुँवारी मंजरी
       फिर कहीं टेसू के सुलगे अंग-अंग,
       लौट कर परदेश से चुपचाप फिर,
       बस गया कुसुमी लताओं पर अनंग

चुप खड़ी सरसों की गोरी सी हथेली
डूब कर हल्दी में पीली हो गई।

       फिर उड़ा रह-रह के आँगन में अबीर
       फिर झड़े दहलीज पर मादक गुलाल,
       छोड़ चन्दन-वन चली सपनों के गांव
       गंध कुंकुम के गले में बाँह डाल

और होने के लिए रंगों से लथपथ
रेशमी चूनर हठीली हो गई।
- रामानुज त्रिपाठी
विषय:
होली (9)
प्रकृति (41)
वसन्त (5)

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इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों'
शान्ति मेहरोत्रा


चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?

मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;

तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!

मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
..

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भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से, भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।

प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...

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इस महीने :
'नफ़रत'
विस्सावा शिंबोर्स्का


देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!

यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद ..

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इस महीने :
'न्यूज़ चैनल'
प्रियदर्शन


यहाँ त्रासदियाँ
प्रहसन में बदली जाती हैं,
भाषा तमाशे में
और लोग कठपुतलियों में।
तबाहियों की खुराक
इसका पेट भरती है।
बहुत मनोयोग से
किया जाता है
..

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