अप्रतिम कविताएँ
सम्पूर्ण यात्रा
प्यास तो तुम्हीं बुझाओगी नदी
मैं तो सागर हूँ
प्यासा
अथाह।

तुम बहती रहो
मुझ तक आने को।
मैं तुम्हें लूँगा नदी
सम्पूर्ण।

कहना तुम पहाड़ से
अपने जिस्म पर झड़ा
सम्पूर्ण तपस्वी पराग
घोलता रहे तुममें।

तुम सूत्र नहीं हो नदी न ही सेतु
सम्पूर्ण यात्रा हो मुझ तक
जागे हुए देवताओं की चेतना हो तुम।

तुम सृजन हो
चट्टानी देह का।
प्यास तो तुम्ही बुझाओगी नदी।

मैं तो सागर हूँ
प्यासा
अथाह
- दिविक रमेश
विषय:
नदी (3)
सागर (3)

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अन्य राशि
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

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इस महीने :
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वाणी मुरारका


आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
क्या गढ़ूँगी?
कौन से देश की नागरिक बनूँगी?
सवाल खुद से करती हूँ|
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
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ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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