किसके संग गाए थे
रात यदि श्याम नहीं आए थे
मैंने इतने गीत सुहाने किसके संग गाए थे?

गूँज रहा अब भी वंशी स्वर,
मुख-सम्मुख उड़ता पीताम्बर।
किसने फिर ये रास मनोहर
वन में रचवाये थे?

शंका क्यों रहने दें मन में
चल कर सखि देखें मधुवन में
पथ के काटों ने क्षण-क्षण में
आँचल उलझाए थे।

मुझे याद है हरि ने छिप कर
मुग्ध दृष्टि डाली थी मुझ पर
क्यों अंगों में सिहर रही भर
भेंट न यदि पाये थे।
- मिलाप दूगड़

काव्यालय पर प्रकाशित: 9 Apr 2021

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इस महीने :
'स्वीकार करो यह प्रार्थना '
शरद कुमार


हे प्रभु अब हिम्मत और विश्वास रख पाने का बल दो
काल के पंजों को रोक जीवन का अमृत विमल दो

भय से है आक्रांत मानव लाश ढोते थक गया है
निर्भय करो अपनी कृपा से मन में आशाएं प्रबल दो

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
हम खड़े हो जाएँ अपनी बेड़ियों को तोड़ कर।
रोशनी की ओर चल दें तीरगी को छोड़ कर।
ख़त्म जब हो जाएंगी माज़ी की सब रुस्वाइयाँ,
खुद-बख़ुद मुड़ जाएगा यह वक़्त अगले मोड़ पर।

~ विनोद तिवारी

संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" में कविताओं के बीच बीच कई मुक्तक भी हैं, जैसे कि यह

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