अप्रतिम कविताएँ
प्रेम
किसी चट्टान की
खुरदुरी सतह पर उभरी
किसी दरार पर
हौले से अपना हाथ यूँ रखो
मानो पूछ रहे हो
उससे उसकी खैरियत।
तुम देखना
कुछ समय बाद
वहाँ कोई कोंपल फूट गई होगी
अथवा
उस दरार में
पानी के निशान होंगे।
- सुरेश बरनवाल
[email protected]
विषय:
प्रेम (63)

काव्यालय को प्राप्त: 18 Jun 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 26 Jul 2019

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हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
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किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे,
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..

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