अप्रतिम कविताएँ
पेड़, मैं और सब
पेड़ नहीं हैं, उठी हुई
धरती की बाहें हैं
तेरे मेरे लिए माँगती
रोज दुआएँ हैं।
         पेड़ नहीं हैं ये धरती की
         खुली निगाहें हैं
         तेरे मेरे लिए निरापद
         करती राहे हैं।
पेड़ नहीं ये पनपी धरती
गाहे गाहे हैं
तेरे मेरे जी लेने की
विविध विधाएँ हैं।
         पेड़ नहीं ये धरती ने
         यत्न जुटाए हैं
         तेरे मेरे लिऐ खुशी के
         रत्न लुटाये हैं।
पेड़ नहीं ये धरती ने
चित्र बनाए हैं
तेरे मेरे लिए अनेकों
मित्र जुटाए हैं।
         पेड़ नहीं ये धरती ने
         चँवर डुलाए हैं।
         तेरे मेरे लिऐ छाँह के
         गगन छवाए हैं।
पेड़ नहीं ये धरती ने
अलख जगाए हैं
तेरे मेरे 'ढूँढ' के
जतन जताए हैं।
         पेड़ नहीं है अस्तित्वों के
         बीज बिजाए हैं
         तेरे मेरे जीने के
         विश्वास जुड़ाए हैं।
- मरुधर मृदुल
Poet's Address: Ganeshlal Ustad Marg,
71, Nehru Park, Jodhpur-342003
Ref: Naye Purane, 1999

English translation of this poem by Vani Murarka: "Trees, me and everyone"
विषय:
प्रकृति (41)
पेड़ (6)

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इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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