अप्रतिम कविताएँ
कैसे रो दूँ
नारी तो नीरों से धो लेती है अपने सुख दुख को,
मोती की बूँदों से सज्जित कर लेती अपने मुख को।
बाहर से वह कोमल होकर अन्दर दृढ हो जाती है,
ऐसा करने पर नारी की छवि नहीं खो जाती है।

लेकिन नर की बात अलग है, वह तो सब सह जाता है,
किन्तु कभी जो रोया तो फिर वह नारी कहलाता है।
पुरुष हूँ मैं, बलवान छवि को यूँ ही मैं कैसे खो दूँ,
पौरुष के आडम्बर को झुठला कर मैं कैसे रो दूँ।

मेरे अपनों को भी किस्मत ने बेवक्त ही छीना है,
लोगों की बातें सुनकर छलनी मेरा भी सीना है।
बार बार विफलता पाकर मैं भी आहत होता हूँ,
आशाओं पर पानी फिरता है तो मन में रोता हूँ।

दुनिया के आगे नर को दुख कहने का अधिकार नहीं,
पत्थर-दिल तो स्वीकृत है, पर भावुक नर स्वीकार नहीं।
आँसू का आभुषण जग को नारी पर ही भाया है,
मेरी भावुकता को आडम्बर कहकर ठुकराया है।

ऐसे हालातों में पौरुष का यह स्वांग ही बचता है,
सच कोई न माने तो यह झूठ नए नित रचता है।
तुम ही मुझे बताओ भला पुरुषार्थ यह मैं कैसे खो दूँ,
पौरुष के आडम्बर को झुठला कर मैं कैसे रो दूँ।
- वैभव नेहरा
Email: [email protected]
विषय:
पुरुष (2)

काव्यालय को प्राप्त: 15 Oct 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Mar 2018

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