अप्रतिम कविताएँ
हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या?
हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या ?

तेरी चाह है सागरमथ भूधर,
उद्देश्य अमर पर पथ दुश्कर
             कपाल कालिक तू धारण कर
             बढ़ता चल फिर प्रशस्ति पथ पर
जो ध्येय निरन्तर हो सम्मुख
फिर अघन अनिल का कोइ हो रुख
             कर तू साहस, मत डर निर्झर
             है शक्त समर्थ तू बढ़ता चल
जो राह शिला अवरुद्ध करे
तू रक्त बहा और राह बना
             पथ को शोणित से रन्जित कर
             हर कन्टक को तू पुष्प बना
नश्वर काया की चिन्ता क्या?
हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या ?

है मृत्यु सत्य माना पाति
पर जन्म कदाचित महासत्य
             तुझे निपट अकेले चलना है
             हे नर मत डर तू भेद लक्ष्य
इस पथ पर राही चलने में
साथी की आशा क्यों निर्बल
             भर दम्भ कि तू है अजर अमर
             तेरा ध्येय तुझे देगा सम्बल
पथ भ्रमित न हो लम्बा पथ है
हर मोड खड़ा दावानल है
             चरितार्थ तू कर तुझमे बल है
             है दीर्घ वही जो हासिल है
बन्धक मत बन मोह पाशों का
ये मोह बलात रोकें प्रतिपल
             है द्वन्द्व समर में मगर ना रुक
             जो नेत्र तेरे हो जायें सजल
बहते अश्रु की चिन्ता क्या
हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या ?
- अमित कपूर
Amit Kapoor
Email : [email protected]
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विषय:
जीवन (37)

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जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

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इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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