एकदशानन
अक्सर मेरे विचार बार बार जनक के खेत तक जाते हैं
परन्तु हर बार मेरे विचार कुछ और उलझ से जाते हैं।
जनक अगर सदेह थे, तो विदेह क्यों कहलाते हैं?
क्यों हमेशा हर बात में हम रावण को दोषी पाते हैं?
अक्सर मेरे विचार बार बार जनक के खेत तक जाते हैं।

क्यों दशानन रक्तपूरित कलश जनक के खेत में दबाता है?
क्यों जनक के हल का फल उस घड़े से ही टकराता है?
कैसे रावण के पाप का घड़ा कन्या का स्वरूप पाता है?
क्यों उस कन्या को जनकपुर सिंहासन बेटी स्वरूप अपनाता है?
किस रिश्ते से उस बालिका को जनकपुत्री बताते हैं?
मेरे विचार फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं।

क्यों रावण सीता-स्व्यंवर में बिना बुलाये जाता है?
क्यों उस सभा में होकर भी वह स्पर्धा से कतराता है?
क्यों उसको ललकार कर प्रतिद्वन्दी बनाया जाता है?
क्यों लंकापति शिवभक्त शिव-धनुष तोड़ नहीं पाता है?
क्यों रावण की अल्प्शक्ति पर शंकर स्वयं चकराते हैं?
मेरे विचार फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं।

क्यों इतना तिरस्कृत होकर भी फिर चित्रकूट वह जाता है?
किस प्रेम के वश में वह सीता को हर ले जाता है?
कितना पराक्रमी, बलशाली, पर सिया से मुँह की खाता है।
क्यों जानकी को राजभवन नहीं, अशोकवन में ठहराता है?
क्या छल-छद्म पर चलने वाले इतनी जल्दी झुक जाते हैं?
मेरे विचार फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं।

क्यों इतिहास दशानन को इतना नीच बताता है?
फिर भी लंकापति मृत्युशैया पर रघुवर को पाठ पढ़ाता है।
वह कौन सा ज्ञान था जिसे सुनकर राम नतमस्तक हो जाते हैं?
चरित्रहीन का वध करके भी रघुवर क्यों पछताते हैं?
रक्तकलश से कन्या तक का रहस्य समझ नहीं पाते हैं
इसीलिए तो मेरे विचार जनक के खेत तक जाते हैं।
- स्वप्न मंजुषा शैल
Swapna Shail
Email : [email protected]
Swapna Shail
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इस महीने :
'स्वीकार करो'
भगवती चरण वर्मा


अर्पित मेरी भावना-- इसे स्वीकार करो ।

तुमने गति का संघर्ष दिया मेरे मन को,
सपनों को छवि के इन्द्रजाल का सम्मोहन;
तुमने आँसू की सृष्टि रची है आँखों में
अधरों को दी है शुभ्र मधुरिमा की पुलकन।

उल्लास और उच्छ्वास तुम्हारे ही अवयव
तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया,
अभिशाप बनाकर तुमने मेरी सत्ता को
मुझको पग-पग पर मिटने का वरदान दिया,
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इस महीने :
'छापे माँ तेरे हाथों के'
शार्दुला झा नोगजा


कोहबर की दीवारों जैसे
मेरे अन्तर के आँगन में,
धुँधले से, पर अभी तलक हैं,
छापे माँ तेरे हाथों के।

कच्चे रंग की पक्की स्मृतियाँ
सब कुछ याद कहाँ रह पाता
स्वाद, खुशबुएँ, गीतों के स्वर
कतरे कुछ प्यारी बातों के।

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इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल मटोल, चार पैर पर
घर आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
मेरा परिसीमन भांप लिया

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इस महीने :

'मोतीयों पर टहलते हुए'
पूनम दीक्षित


एक काव्य यात्रा है| एक अहसास से दूसरे अहसास तक धीरे धीरे टहलते हुए कोई आपा धापी नहीं, बवंडर नहीं। यह टहलना एक निश्चित संवृद्धि और मंजिल की ओर गतिशील है। संवृद्धि भावों की, संवृद्धि अनुभूति की। कुछ भी बलात लिखने के लिए लिखा सा नहीं है। कवि का उदगार ईमानदारी से प्रस्तुत है कि “सत्य और स्वप्न के बीच कोई ज्यामितीय रेखा नहीं है। इनके बीच की सरहद बादल की तरह चलायमान है।” ..

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