अप्रतिम कविताएँ
एक कवि का अंतर्द्वंद्व
वह बहुत उदास-सी शाम थी
जब मैं उस स्त्री से मिला

मैंने कहा - मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
फिर सोचा - यह कहना कितना नाकाफ़ी है

वह स्त्री एक वृक्ष में बदल गई
फिर पहाड़ में
फिर नदी में
धरती तो वह पहले से थी ही

मैं उस स्त्री का बदलना देखता रहा !

ए‍क साथ इतनी चीज़ों से
प्रेम कर पाना कितना कठिन है
कितना कठिन है
एक कवि का जीवन जीना

वह प्रेम करना चाहता है
एक साथ कई चीज़ों से
और चीज़ें हैं कि बदल जाती हैं
प्रत्येक क्षण में !
- विनय सौरभ
विषय:
जीवन (37)
प्रेम (63)
विस्तार (13)
स्त्री (19)

काव्यालय को प्राप्त: 2 Aug 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 17 Sep 2021

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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