दोहे
तिय उसास पिय बिरह तें उससि अधर लौं आइ।
कछु बाहर निकसति कछुक, भीतर को फिरि जाइ॥

गवन समय पिय के कहति, यौं नैनन सों तीय।
रोवन के दिन बहुत हैं, निरखि लेहु खिन पीय॥

लाल एक दृग अगिन तें, जारि दियो सिव मैन।
करि ल्याये मो दहन को, तुम द्ववै पावक नैन॥

कहा कहौं वाकी दसा, जब खग बोलत रात।
'पीय' सुनत ही जियत है, 'कहाँ' सुनति मरि जात॥

देह दिपति छ्बि गेह की, किहि बिधि बरनी जाय।
जा लखि चपला गगन तें, छिति फरकत निज आय॥

चंद्रमुखी जूरो चितै, चित लीन्हो पहचानि।
सीस उठायो है तिमिर, ससि को पीछे जानि॥

मुकुर बिमलता, चंद दुति, कंज मृदुलता पाय।
जनम लेइ जो कंबु तें, लहै कपोल सुभाय॥

मुख छबि निरख चकोर अरु, तन पानिप लखि मीन।
पद पंकज देखत भँवर, होत नयन रसलीन॥

अमी हलाहल मद भरे, सेत, स्याम, रतनार।
जियत, मरत, झुकि-झुकि परत, जेहि चितवत इक बार॥

मुकुत भए घर खोए कै, कानन बैठे जाय।
घर खोजत हैं और को, कीजे कौन उपाय॥

बारन निकट ललाट यों, सोहत टीका साथ।
राहू गहत महु चंद पै, राख्यो सुरपति हाथ॥
- रसलीन

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तोड़ दो सीमा क्षितिज की,
गगन का विस्तार ले लो


विनोद तिवारी की कविता "प्यार का उपहार" का वीडियो। उपहार उनका और वीडियो द्वारा उपहार का सम्प्रेषण भी वह ही कर रहे हैं। सरल श्रृंगार रस और अभिसार में भीगा, फिर भी प्यार का उपहार ऐसा जो व्यापक होने को प्रेरित करे।

प्यार का उपहार
इस महीने :
'अधूरी साधना'
वाणी मुरारका


प्रियतम मेरे,
सब भिन्न भिन्न बुनते हैं
गुलदस्तों को,
भावनाओं से,
विचारों से।
मैं तुम्हे बुनूँ
अपनी साँसों से।
भावनायें स्थिर हो जाएँ,
विचारधारा भी
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'प्रेम अक्षत'
आभा सक्सेना


आप सुन तो रहें हैं
मेरे गीत यह
मन के मन्दिर में दीपक
जलाये तो हैं
आपके सामने बैठ कर
अनगिनत, अश्रु पावन
नयन से गिराये तो हैं
नेह की डालियों से
सुगन्धित सुमन
सांवरे श्री चरण पर
चढ़ाये तो हैं
..

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