अप्रतिम कविताएँ
एक रात
अँधियारे जीवन-नभ में
बिजुरी-चमक गयी तुम!

सावन झूला झूला जब
बाँहों में रमक गयीं तुम!

कजली बाहर गूँजी जब
श्रुति-स्वर-सी गमक गयीं तुम!

महकी गंध त्रियामा जब
पायल-झमक गयीं तुम!

तुलसी-चौरे पर आकर
अलबेली छमक गयीं तुम!

सूने घर-आँगन में आ
दीपक-सी दमक गयीं तुम!
- डा. महेन्द्र भटनागर
विषय:
प्रेम (63)

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रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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