अप्रतिम कविताएँ
दरख़्त-सी कविता
दरख़्त-सी कविता
तनी रहती है, खड़ी रहती है
झंझावातों को हँसकर भगा देती है
बिजली, वर्षा, ओलों की चोटों के बाद भी
देती रहती है हरियाली
विचारों के अकाल में

आसान नहीं होता दरख़्त-सी कविता को
ढहा देना

'यदा यदा हि धर्मस्य' की ग्लानि के लिए
शताब्दी में आता है कोई कलयुगपुरुष
'जानामि अधर्मं, न च मे निवृत्ति' की तरह
जब पैदा होता है कोई दुर्योधन, कोई कंस
तब बड़ी साजिशों के साथ
आरा, कुल्हाड़ा चलाकर
काटे जाते हैं ऐसी कविता के हाथ पाँव
भूलकर कि फिर कोपलें फूट आती हैं
जैसे प्रेम अँखुआता ही है
भेद के जहरीले संसार में भी
जैसे हर दंगे में घुली होती है
बचाने वाले की भी कहानी

बस तपस्वी-सा
देना पड़ता है दरख़्त बनने-सा समय कविता को
और छाया मिलती रहती है पीढ़ी दर पीढ़ी।

- प्रकाश देवकुलिश
दरख्त = पेड़
जानामि अधर्मं न च मे निवृत्ति = मैं जानता हूँ अधर्म क्या है, लेकिन उसे छोड़ ही नहीं सकता हूँ

काव्यालय को प्राप्त: 22 Jul 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 6 Aug 2021

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नेक बने मनुष्य
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स्वागत है अपनी...

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लेकिन इस कंकाल सी लड़की के भीतर एक कविता बची हुई थी-- मनुष्य के विवेक पर आस्था रखने वाली एक कविता। वह देख रही थी कि अमेरिकी सैनिक वहाँ पहुँच रहे हैं। इनमें सबसे आगे कर्ट क्लाइन था। उसने उससे पूछा कि वह जर्मन या अंग्रेजी कुछ बोल सकती है? गर्डा बताती है कि वह 'ज्यू' है। कर्ट क्लाइन बताता है कि वह भी 'ज्यू' है। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा यह बात हैरानी में डालती है कि इसके बाद गर्डा जर्मन कवि गेटे (Goethe) की कविता 'डिवाइन' की एक पंक्ति बोलती है...

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