अप्रतिम कविताएँ

अभिसार गा रहा हूँ
ले जाएगा कहाँ तू
मुझसे मुझे चुरा के!

पत्थर के इस नगर में
करबद्ध प्रार्थनाएँ,
इस द्वार सर झुकाएँ,
उस द्वार तड़फड़ाएँ,;
फिर भी न टूटती हैं,
फिर भी न टूटनी है,
चिर मौन की कथाएँ,
चिर मौन की प्रथाएँ,

क्यों टेरता है रह-रह
मुझे बाँसुरी बना के!

उजड़े चतुष्पथों पर
बिखरे हुए मुखौटे,
जो खो गए स्वयं से
औ’ आज तक न लौटे,
उनमें ही मैं भी अपनी
पहचान पा रहा हूँ,
संन्यास के स्वरों में
अभिसार गा रहा हूँ,

क्यों रख रहा है सपने
मेरी आँख में सजा के!
- अमृत खरे
पुस्तक "मयूरपंख: गीत संग्रह (अमृत खरे)" से
विषय:
प्रेम (63)
भक्ति और प्रार्थना (31)

काव्यालय पर प्रकाशित: 3 Dec 2015

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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