अभिसार गा रहा हूँ
ले जाएगा कहाँ तू
मुझसे मुझे चुरा के!

पत्थर के इस नगर में
करबद्ध प्रार्थनाएँ,
इस द्वार सर झुकाएँ,
उस द्वार तड़फड़ाएँ,;
फिर भी न टूटती हैं,
फिर भी न टूटनी है,
चिर मौन की कथाएँ,
चिर मौन की प्रथाएँ,

क्यों टेरता है रह-रह
मुझे बाँसुरी बना के!

उजड़े चतुष्पथों पर
बिखरे हुए मुखौटे,
जो खो गए स्वयं से
औ’ आज तक न लौटे,
उनमें ही मैं भी अपनी
पहचान पा रहा हूँ,
संन्यास के स्वरों में
अभिसार गा रहा हूँ,

क्यों रख रहा है सपने
मेरी आँख में सजा के!
- अमृत खरे
पुस्तक "मयूरपंख: गीत संग्रह (अमृत खरे)" से

काव्यालय पर प्रकाशित: 3 Dec 2015

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'काव्यालय के आँकड़े - जून 2018 से जून 2019'


यूँ तो काव्यालय 22 वर्षों का जवान है किन्तु पिछले वर्ष ही हमने काव्यालय की पहली वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। काव्यालय हमारा व्यक्तिगत गैर-लाभकारी उद्यम है, किन्तु काव्यालय सिर्फ़ हमारा नहीं है। आपका भी है। आप ही से है। तो इस रिपोर्ट के द्वारा आपके संग काव्यालय के परदे के पीछे की कुछ झलकियाँ साझा करना हमारा हर्ष भी है और कर्तव्य भी।

काव्यालय में जून 2018 से जून 2019 के बीच कविता ने अपने कवियों, पाठकों, सहयोगीयों के संग कैसे जिया? रचनाओं का स्रोत क्या रहा, कितने लोग काव्यालय पढ़ते हैं, आपसे प्राप्त सहयोग और काव्यालय का इस साल का खर्च – यह सब साझा करने के पहले एक सवाल जो अक्सर हमें पूछा जाता है, “काव्यालय पर रचना प्रकाशन की क्या प्रक्रिया है?” उसका उत्तर दे दें, और 8 वर्षों से चला आ रहा एक प्यारा ग्रुप, काव्यालय कुटुम्ब, के विषय में बता दें। ..

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