आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...
आज कुछ माँगती हूँ मैं
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?
मौन का मौन में प्रत्युत्तर
अनछुये छुअन का अहसास
देर तक चुप्पी को बाँध कर
खेलो अपने आसपास
क्या ऐसी सीमा में खुद को
प्रिय बांध सकोगे तुम
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...
तुम्हारे इक छोटे से दुख से
कभी जो मेरा मन भर आये
ढुलक पड़े आँखों से मोती
सीमा तोड़ कर बह जाये
तो ज़रा देर उँगली पर अपने
दे देना रुकने को जगह तुम
उसे थोड़ी देर का आश्रय
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?
आज कुछ मांगती हूँ प्रिय...
कभी जब देर तक तुम्हारी
आंखों में मैं न रह पाऊँ
बोझिल से सपनों के भीड़
में धीरे से गुम हो जाऊँ
और किसी छोटे से स्वप्न
के पीछे जा कर छुप जाऊँ
ऐसे में बिन आहट के समय
को क्या लाँघ सकोगे तुम
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...
काव्यालय पर प्रकाशित: 2 May 2011
इस महीने :
'गुनाह का गीत'
धर्मवीर भारती
अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा
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इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों'
शान्ति मेहरोत्रा
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;
तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!
मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
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भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।
प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते
हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...
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इस महीने :
'नफ़रत'
विस्सावा शिंबोर्स्का
देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!
यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद
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