अप्रतिम कविताएँ
तबीयत से उछालो यारो
यह जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो,
अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो।

दर्दे दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा,
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो।

लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो।

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,
आज संदूक से वे ख़त तो निकालो यारो।

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की,
तुमने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो।
- दुष्यन्त कुमार
शहतीर : लम्बी लकड़ी, लठ्ठ; सय्याद : शिकारी; सीवन : सिलाई ; सूराख़ : छेद
विषय:
विविध (12)
प्रेरणा (20)

काव्यालय पर प्रकाशित: 14 Oct 2022

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