अप्रतिम कविताएँ
सूरज का टुकड़ा
वक़्त के मछुआरे ने
फेंका था जाल
कैद करने के लिए
‘सघन तम’ को

जाल के छिद्रों से
फिसल गया ‘तम’
और
कैद हो गया
सूरज का टुकड़ा

वक़्त का मछुआरा
कैद किए फिर रहा है
सूरज के उस टुकड़े को
और
सघनतम होती जा रही है
‘तमराशि’ घट–घट में

उगानी होगी
नई पौध
सूरज के नए टुकड़ों की

जागृत करनी होगी बोधगम्यता
युग–शिक्षक के अन्तस में

तभी खिलेगी वनराशि
महेकगा वातास
छिटकेंगी ज्ञान–रश्मियाँ
मिट जाएँगी
आप ही आप
आपस की दूरियाँ

आओ!
अभी से
हाँ! अभी से
कूच करें
इस नये पथ की ओर
कहा भी गया है
जब आँख खुले
तभी होती है भोर!



- जगदीश व्योम
तम = अंधेरा; राशि = मात्रा, समूह; बोधगम्यता = समझ आने की क्षमता; वातास = हवा

चित्रकार: नूपुर अशोक
विषय:
प्रेरणा (20)

काव्यालय को प्राप्त: 25 Jan 2022. काव्यालय पर प्रकाशित: 28 Jan 2022

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'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

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हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
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रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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