अप्रतिम कविताएँ
स्मृति दीप
भग्न उर की कामना के दीप,
         तुम, कर में लिये,
मौन, निमंत्रण, विषम, किस साध में हो बाँटती?
         है प्रज्वलित दीप, उद्दीपित करों पे,
                 नैन में असुवन झड़ी!
         है मौन, होठों पर प्रकम्पित,
                 नाचती, ज्वाला खड़ी!
बहा दो अंतिम निशानी, जल के अंधेरे पाट पे,
' स्मृतिदीप ' बन कर बहेगी, यातना, बिछुड़े स्वजन की!
         एक दीप गंगा पे बहेगा,
                 रोयेंगी, आँखें तुम्हारी।
     धुप अँधकाररात्रि का तमस।
         पुकारता प्यार मेरा तुझे, मरण के उस पार से!
बहा दो, बहा दो दीप को
         जल रही कोमल हथेली!
     हा प्रिया! यह रात्रिवेला औ
         सूना नीरवसा नदी तट!
नाचती लौ में धूल मिलेंगी,
         प्रीत की बातें हमारी!
- लावण्या शाह
विषय:
मृत्यु (9)
विरह (13)

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 स्मृति दीप
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ईंटों की दीवा ..

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..

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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