अप्रतिम कविताएँ
फूलों वाला पेड़
मैं मर गया तो पेड़ बनूंगा
फूलों वाला एक विशाल पेड़
तुम कभी थक जाओ तो
कुछ देर आकर बैठना उसके नीचे
मैं झरूंगा तुमपर
फूलों की तरह
धूप की तरह
ओस की बूंदों की तरह
हवा की तरह

तुम आंखें मूंदकर सुनना मुझे
मैं तुम्हें कह रहा होऊंगा - प्यार
तुम भी कह देना मुझे - प्यार
तुम्हारे देखते-देखते मैं भर जाऊंगा
अपनी शाखों पर उड़ान के लिए
पंख तोलते पक्षियों के कलरव से।
- ध्रुव गुप्त
विषय:
प्रेम (63)
विस्तार (13)

काव्यालय को प्राप्त: 10 Mar 2024. काव्यालय पर प्रकाशित: 28 Jun 2024

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इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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