नदी का बहना मुझमे हो
मेरी कोशिश है कि
नदी का बहना मुझमें हो।

तट से सटे कछार घने हों
जगह जगह पर घाट बने हों
टीलों पर मंदिर हों जिनमें
स्वर के विविध वितान तने हों

मीड़ मूर्च्छनाओं का
उठना गिरना मुझमें हो।

जो भी प्यास पकड़ ले कगरी
भर ले जाये खाली गगरी
छूकर तीर उदास न लौटें
हिरन कि गाय बाघ या बकरी

मच्छ मगर घडियाल
सभी का रहना मुझमें हो।

मैं न रुकूँ संग्रह के घर मे
धार रहे मेरे तेवर में
मेरा बदन काट कर नहरे
पानी ले जायें ऊसर मे

जहाँ कहीं हो बंजरपन का
मरना मुझमें हो।
- शिव बहादुर सिंह भदौरिया
मीड़: संगीत में एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाना। मूर्छना: सात स्वरों का आरोह अवरोह। कगरी: ऊँचा किनारा, ओंठ। ऊसर: नोनी भूमि, जहाँ अन्न उत्पन्न नहीं होता है

काव्यालय पर प्रकाशित: 18 Jan 2018

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'चिकने लम्बे केश'
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चिकने लम्बे केश
काली चमकीली आँखें
खिलते हुए फूल के जैसा रंग शरीर का
फूलों ही जैसी सुगन्ध शरीर की
समयों के अन्तराल चीरती हूई
अधीरता इच्छा की
..

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'जबड़े जीभ और दाँत'
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जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
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तुम्हारा सब-कुछ जाँचकर देख लिया गया है
और तुम जँच नहीं रहे हो
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नचाना चाहता है तुम्हें
तुम उतने नच नहीं रहे हो

..

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कुछ नहीं हिला उस दिन
न पल न प्रहर न दिन न रात

सब निक्ष्चल खड़े रहे
ताकते हूए अस्पताल के परदे
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और आती-जाती लड़कियाँ
जिन्हे मैं सिस्टर नहीं कहना चाहता था
..

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शुक्रवार 24 मई को

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