जब कहीं
अनजान रजनी को
ढुलकती साँझ ने
काला,
सितारों से दमकता,
शाल पश्मीना
कभी ओढ़ा दिया --
याद कितने गीत आए।
बिछड़े हुए,
कब से न जाने
मीत आए।
सच कहूँ?
इक पल ना बीता;
तुम्हारी क़सम,
तुम बहुत याद आए।
जब कहीं,
बहकी हवाओं ने
सुकोमल हाथ से,
लजती उषा को
बाज़ुओं में थाम कर,
घूंघट ज़रा सरका दिया
थरथराते ओंठ पर
स्पर्श तेरे याद आए।
गले में दो बाज़ुओं के हार की
उस याद में
ज़िंदगी की हर कसकती हार को
हम भूल आए।
हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..
नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
ताल पर। मैं जानता हूँ उस ताल को।
जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को
..
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।