खिलौना
बीच बाज़ार
खिलौने वाले
के खिलौने
की आवाज़ से
आकर्षित हो
कदम उसकी
तरफ बढ़े,
मैंने छुआ,
सहलाया उन्हें
व एक खिलौने
को अंक में भरा
कि पीछे से कर्कष
आवाज़ ने मुझे
झंझोड़ा
‘‘तुम्हारी बच्चों की सी
हरकतें कब खत्म होंगी!’’
सुनकर मेरा नन्हा बच्चा
सहम सा गया
मेरी प्रौढ़ देह के अन्दर।
- शबनम शर्मा
Email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 5 Nov 2016. काव्यालय पर प्रकाशित: 20 Jul 2017

***
एक शब्द की कविता<br> तुम।<br> <br> एक शब्द में पृथ्वी सारी<br> तुम।<br> एक शब्द में सृष्टि सारी<br> तुम।<br> <br> क्या रिश्ता होगा जब तुम ही हो<br> यह वाणी तेरी<br> <br> ~ तुम<br>
इस महीनेतुम
'तुम नहीं हो?'
अंजु वर्मा


है धुंधलका
हल्का हल्का
ठहरा ठहरा
पाँव पल का
मन हिंडोला डोलता है
मूक अश्रु पूछता है
तुम नहीं हो?
..

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शुक्रवार 27 सितम्बर को

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