खामोशी बहना चाहती थी
मैं नदी बन गई
खामोशी उड़ना चाहती थी
मैं हवा बन गई
खामोशी अब खेलना चाहती है
मैंने उसे शब्द थमा दिए
वह बोलना भी चाहती है
मैंने एक कलम पकड़ा दी
अब वह हंसना और रोना चाहती है
खामोशी कविता में ढल गई।
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।