काव्यालय क्विज़

वाणी मुरारका, नूपुर अशोक

कविताओं के संग एक खेल खेलें? यह है काव्यालय क्विज़! देखें आपके कितने उत्तर सही आते हैं।

घबराइएगा नहीं। यह स्कूल की परीक्षाओं जैसा नहीं है। हर प्रश्न में ही उत्तर छिपा है। ठीक से ढूँढेंगे तो आपको 10/10 मिल सकते हैं। हर प्रश्न इस उद्देश्य से बनाया गया है कि उसके ज़रिए आप कई अद्भुत कविताओं से मुलाकात कर सकें, उनमें डूब सकें।

प्रकाशित: 30 जनवरी 2026

विषय:
विविध (12)
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इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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