इक कविता
कुछ पल के उथले चिंतन से
कभी जनमती है इक कविता
वर्षों कवि के अंतर्मन में
कभी पनपती है इक कविता

दो नयनों में बन अश्रु-बिन्द
कभी चमकती है इक कविता
दो अधरों की मुस्कान बनी
कभी ठुमकती है इक कविता

सूने बिस्तर की सिलवटों में
कभी सिसकती है इक कविता
दो बाहों के आलिंगन में
कभी सिमटती है इक कविता

पूजा के श्रद्धा सुमनों सी
कभी महकती है इक कविता
क्रोधाग्नि की ज्वाला बन कर
कभी धधकती है इक कविता

वात्सल्य भरी, ममतामय सी
कभी छलकती है इक कविता
आवेश ईर्ष्या द्वेष भरी
कभी उफ़नती है इक कविता

मेरे मत से उत्पन्न हो कर
मेरे भावों से निखर सँवर
तेरे निष्ठुर मन तक भी क्या
कभी पहुँचती है इक कविता ?
- अर्चना गुप्ता
Archana Gupta
Email : [email protected]

काव्यालय पर प्रकाशित: 1 Apr 2016

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अर्चना गुप्ता
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सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ।

यह न मुझसे पूछना, मैं किस दिशा से आ रहा हूँ,
है कहाँ वह चरणरेखा, जो कि धोने जा रहा हूँ,
पत्थरों की चोट जब उर पर लगे,
एक ही "कलकल" कहो, तो ले चलूँ।

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ।

मार्ग में तुमको मिलेंगे वात के प्रतिकूल झोंके,
दृढ़ शिला के खण्ड होंगे दानवों से राह रोके,
यदि प्रपातों के भयानक तुमुल में,
भूल कर भी भय न हो, तो ले चलूँ।

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
..

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