अप्रतिम कविताएँ पाने
एक कवि का अंतर्द्वंद्व
वह बहुत उदास-सी शाम थी
जब मैं उस स्त्री से मिला

मैंने कहा - मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
फिर सोचा - यह कहना कितना नाकाफ़ी है

वह स्त्री एक वृक्ष में बदल गई
फिर पहाड़ में
फिर नदी में
धरती तो वह पहले से थी ही

मैं उस स्त्री का बदलना देखता रहा !

ए‍क साथ इतनी चीज़ों से
प्रेम कर पाना कितना कठिन है
कितना कठिन है
एक कवि का जीवन जीना

वह प्रेम करना चाहता है
एक साथ कई चीज़ों से
और चीज़ें हैं कि बदल जाती हैं
प्रत्येक क्षण में !
- विनय सौरभ

काव्यालय को प्राप्त: 2 Aug 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 17 Sep 2021

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इस महीने :
'धूप का टुकड़ा'
ममता शर्मा


सुनो!
आज पूरे दिन मैं भागता रहा
धूप के एक टुकड़े के पीछे,
सुबह सवेरे खिड़की से झाँक रहा था
तो मैं उसे पकड़ कर बैठ गया

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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'कच्ची-कच्ची धूप'
कल्पना मनोरमा


सरसों के दामन से लिपटी
मन से कच्ची-कच्ची धूप ।।

बूढ़ा जाड़ा मोहपाश में
दिन को जकड़े रहता
काँख गुदगुदी करता सूरज
दिन किलकारी भरता

कभी फिसलती कभी सम्हलती
करती माथा-पच्ची धूप ।।
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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'नया वर्ष'
अज्ञात


नए वर्ष में नई पहल हो
कठिन ज़िंदगी और सरल हो
अनसुलझी जो रही पहेली
अब शायद उसका भी हल हो
... ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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