धूप ही क्यों
धूप ही क्यों छाँव भी दो
पंथ ही क्यों पाँव भी दो
सफर लम्बा हो गया अब,
ठहरने को गाँव भी दो ।
प्यास ही क्यों नीर भी दो
धार ही क्यों तीर भी दो
जी रही पुरुषार्थ कब से,
अब मुझे तकदीर भी दो ।
पीर ही क्यों प्रीत भी दो
हार ही क्यों जीत भी दो
शून्य में खोए बहुत अब,
चेतना को गीत भी दो ।
ग्रन्थ ही क्यों ज्ञान भी दो
ज्ञान ही क्यों ध्यान भी दो
तुम हमारी अस्मिता को,
अब निजी पहचान भी दो ।
-
साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा
काव्यालय को प्राप्त: 1 Jan 1997.
काव्यालय पर प्रकाशित: 1 Jan 1997
इस महीने :
'गुनाह का गीत'
धर्मवीर भारती
अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...