अभिषेक
आज दसों दिशाएँ सखियाँ बनकर परम प्रभु की अर्चना के लिए आकाश से पृथ्वी पर उतरी हैं।

आज हमारा है अभिषेक,
रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।
दसों दिशाएँ सखियाँ बनकर,
महासिन्धु से स्वर्ग कलश भर
रंग - रंग के परिधानों में,
नभ - मन्डल से उतरीं भू पर ।

आज हमारा है अभिषेक,
रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।

आज मनीषा मंगलमय हो,
उल्लासों से पूर्ण हृदय हो ।
पृथिवी नभ के अन्तराल में,
गूँज रहा स्वर जय जय जय हो ।

आज हर्ष का है अतिरेक,
रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।

लोक - लोक के पुष्प सुगन्धित,
करने को श्रद्धा निज अर्पित,
आज सागरों के अंतर में,
भरा भावना का आवेश ।

आज हमारा है अभिषेक,
रक्तिम आज क्षितिज की रेख ।
- सत्यकाम विद्यालंकार
Ved Pushpanjali - Satyakam Vidyalankar
ऋग्वेद और सामवेद के इस श्लोक से प्रेरित

असर्जि वक्वा रथ्ये यथाजौ, धिया मनोता प्रथमा मनीषा ।
दश स्वसारो अधि सानो अव्ये, मृजन्ति वह्निं सदनेष्वच्छ ॥
- ऋग्वेद ९|९१|१ - सामपूर्वाचिक ६।५।११

***
तोड़ दो सीमा क्षितिज की,
गगन का विस्तार ले लो


विनोद तिवारी की कविता "प्यार का उपहार" का वीडियो। उपहार उनका और वीडियो द्वारा उपहार का सम्प्रेषण भी वह ही कर रहे हैं। सरल श्रृंगार रस और अभिसार में भीगा, फिर भी प्यार का उपहार ऐसा जो व्यापक होने को प्रेरित करे।

प्यार का उपहार
इस महीने :
'अधूरी साधना'
वाणी मुरारका


प्रियतम मेरे,
सब भिन्न भिन्न बुनते हैं
गुलदस्तों को,
भावनाओं से,
विचारों से।
मैं तुम्हे बुनूँ
अपनी साँसों से।
भावनायें स्थिर हो जाएँ,
विचारधारा भी
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'प्रेम अक्षत'
आभा सक्सेना


आप सुन तो रहें हैं
मेरे गीत यह
मन के मन्दिर में दीपक
जलाये तो हैं
आपके सामने बैठ कर
अनगिनत, अश्रु पावन
नयन से गिराये तो हैं
नेह की डालियों से
सुगन्धित सुमन
सांवरे श्री चरण पर
चढ़ाये तो हैं
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website