पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥
- मीराबाई

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मीराबाई
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 घर आवो जी सजन मिठ बोला
 तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे
 पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे
 पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो
 मेरे तो गिरिधर गोपाल
 श्याम मोसूँ ऐंडो डोलै हो
इस महीने
'मेरे सम्बन्धीजन'
परमहंस योगानन्द


समाधि के विस्तृत महाकक्ष में,
जो लाखों झिलमिलाते प्रकाशों से दीप्त,
और बर्फीले बादल की चित्र यवनिका से शोभायमान है,
मैंने गुप्त रूप से अपने सभी - दीन-हीन, गर्वित सम्बन्धीजनों को देखा।

महान प्रीतिभोज संगीत से उमड़ा,
ओम का नगाड़ा बजा अपनी ताल में।
अतिथि नाना प्रकार के सजे,
कुछ साधारण, कुछ शानदार पोशाकों में। ..
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शुक्रवार 20 जुलाई को

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