तुम
एक ख़्वाब की नदी सी
मुझमें जो बहती हो

अलसाए दिन ढ़ोते हैं
उनींदी रातों को

मैं जानता नहीं ये क्या है
मैं सोचता नहीं ये क्यों है

हर बार तुम्हे मिटाता हूँ
हर बार तुम बन जाती हो

एक ख़्वाब की नदी सी ...
- जितेन्द्र दवे
Jitendra Dave
email: [email protected]
Jitendra Dave
email: [email protected]

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इस महीने
'क्षुद्र की महिमा'
श्यामनंदन किशोर


शुद्ध सोना क्यों बनाया, प्रभु, मुझे तुमने,
कुछ मिलावट चाहिए गलहार होने के लिए।

जो मिला तुममें भला क्या
भिन्नता का स्वाद जाने,
जो नियम में बंध गया
वह क्या भला अपवाद जाने!

जो रहा समकक्ष, करुणा की मिली कब छांह उसको
कुछ गिरावट चाहिए, उद्धार होने के लिए।
..

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शुक्रवार 22 फरवरी को

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