Toggle navigation
English Interface
संग्रह से कोई भी रचना
काव्य विभाग
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
मुक्तक
प्रतिध्वनि
काव्य लेख
सहयोग दें
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
तुम
एक ख़्वाब की नदी सी
मुझमें जो बहती हो
अलसाए दिन ढ़ोते हैं
उनींदी रातों को
मैं जानता नहीं ये क्या है
मैं सोचता नहीं ये क्यों है
हर बार तुम्हे मिटाता हूँ
हर बार तुम बन जाती हो
एक ख़्वाब की नदी सी ...
- जितेन्द्र दवे
Jitendra Dave
email:
[email protected]
Jitendra Dave
email:
[email protected]
विषय:
प्रेम (62)
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।
₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
इस महीने :
'कल'
रणजीत मुरारका
कल कहाँ किसने
कहा देखा सुना है
फिर भी मैं कल के लिए
जीता रहा हूँ।
आज को भूले
शंका सोच भय
से काँपता
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'365 सिक्के'
पारुल 'पंखुरी'
तीन सौ पैंसठ
सिक्के थे गुल्लक में
कुछ से मुस्कुराहटें खरीदीं
कुछ से दर्द,
कुछ से राहतें,
कुछ खर्चे ..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'चाँद के साथ-साथ'
चेतन कश्यप
पेड़ों के झुरमुट से
झाँकता
चाँद पूनम का
बिल्डिंगों की ओट में
चलता है साथ-साथ
भर रास्ते
पहुँचा के घर
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
संग्रह से कोई भी रचना
| काव्य विभाग:
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
|
प्रतिध्वनि
|
काव्य लेख
सम्पर्क करें
|
हमारा परिचय
सहयोग दें