तुम
एक ख़्वाब की नदी सी
मुझमें जो बहती हो

अलसाए दिन ढ़ोते हैं
उनींदी रातों को

मैं जानता नहीं ये क्या है
मैं सोचता नहीं ये क्यों है

हर बार तुम्हे मिटाता हूँ
हर बार तुम बन जाती हो

एक ख़्वाब की नदी सी ...
- जितेन्द्र दवे
Jitendra Dave
email: [email protected]
Jitendra Dave
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इस महीने :
'समय बना है यादों से'
सुमन शुक्ला


आज हुआ मन को विश्वास
समय बना है यादों से
यादें बनती भूल भूल कर
तुम क्या इस को स्वीकारोगे?
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इस महीने :
'कैसा परिवर्तन'
आभा सक्सेना


प्रकृति मौन हो देख रही है
आज समय का परिवर्तन
मृत्यु खेलती है आंगन में
करती है भीषण नर्तन।

झंझावातों में मनुष्य का
साहस संबल टूट गया
भूल गया सब खेल अनोखे
भूल गया पूजा अर्चन।
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इस महीने :

'अभिभूत करतीं दिव्य-भव्य कवितायें : समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न'
अमृत खरे


विशिष्ट गीत कवि अमृत खरे की "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" पर पुस्तक समीक्षा

कविता संग्रह शूरु से अन्त तक पढ़ा, गुना, अनुभव किया और जिया| उसमें डूबा| मैं मैं न रहा| स्वयं कवि विनोद तिवारी हो गया| परकाया प्रवेश हो गया| यह निश्चित ही कवि और कविता की "सिद्धि" को सिद्ध करता है|

काव्य-संग्रह में अग्रज डॉ. तिवारी की कविता के अनेक रंग... ..

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इस महीने :

'समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न'
विनोद तिवारी


विनोद तिवारी की कविताओं का संकलन
काव्यालय का पुस्तक प्रकाशन
वाणी मुरारका की चित्रकला के संगे
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