आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
चलते रहें बस राह पर,
मंज़िल से बेफ़िक्र होकर...
शोर में भी एक ख़ामोशी,
जैसे गहरा कोई मर्म है।
न जीत का कोई जश्न हो,
न हार का कोई डर हो,
बस बहते रहें उस नदी की तरह,
जिसका समंदर में ही घर हो।
काव्यालय को प्राप्त: 30 Jun 2026.
काव्यालय पर प्रकाशित: 28 Aug 2026