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स्वप्न के गलियारे में
हैं सत्य ये नयन जब
होगा स्वप्न अस्तित्व भी
स्वप्न के गलियारे में
उन्नत आकाश होता है
ऊसर धरा में अंकुर जैसे
दमक चमक जाते हैं ये
स्वप्न के गलियारे में
कितना उल्लास होता है
अचानक उड़ जाते हैं पखेरू
मेरी सामर्थ्य से कहीं दूर
स्वप्न के गलियारे में
निरर्थक प्रयास होता है
होगे यें भी सत्य ही
तुम्हारे कहे शब्द कदाचित
स्वप्न के गलियारे में
मरीचिका आभास होता है
ना जाने कैसे क्यूँ
ये भूल गया था मैं
स्वप्न के गलियारे में
घोर कुहास होता है
परंतु आज नवस्वप्न लेकर
मैं फिर निकल पड़ा हूँ
स्वप्न के गलियारे में
जहां मंद प्रकाश होता है
- विकास अग्रवाल
Vikas Agarwal
Email:
[email protected]
Vikas Agarwal
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विषय:
विस्तार (13)
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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार
स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।
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अतीत को खरोंचते हुए
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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