शून्य
नौ असम अंक, और एक सम आधार,
‘आदि’ से ‘अन्त’ तक जुड़ा वह बेछोर वक्री आकार, ‘शून्य’।

सुबह के उत्तेजित मुख पर छिटका सिन्दूर,
पराजित शाम की रगों में ठंडा होता खून!
झील की असीम शांति में सोया,
सागर लाहरों के ताण्डव में खोया ।
नीले आकाश की रिक्तता से रिक्त,
आकाश गंगा के तारों में फैला विस्तृत,
विशाल ‘शून्य’ ।

तरुणी के चंचल नयनों की थाह,
‘प्रेम – मोह’ के मध्य वह संकरी सी राह ।
सम्बंधों के चौराहे पर, संकल्पों का पेड़,
तिन – तिन कर झरते पत्ते, यह मौसम का फेर ।
खण्डित, बोझिल हृदय का एकांत,
मन – मस्तिष्क का चलता युध्द नितांत ।
सब ‘शून्य’ ।

स्वार्थ के मंच पर भावनाओं से क्रीड़ा,
पत्थर तोड़ते नाज़ुक हृदय की पीड़ा ।
तर्क तक सीमित वह ज्ञान,
प्रकृति से जूझता, असफल विज्ञान ।
लाशों के ढेर पर जनतंत्र की पताका,
‘उत्पत्ति’ के नाम पर एटम – बम का धमाका ।
और फिर ‘शून्य’ ।

पर ‘आत्म’ बेकल भटकता है, परमात्म पाने को,
विडम्बनाओं और आस्थाओं की भीड़ में ,
खोजता ‘शून्य’ को एक ‘शून्य’ ।
- संजीव शर्मा
Sanjeev Sharma
Email: sanjeev.sharma<at>gmail.com

***
तोड़ दो सीमा क्षितिज की,
गगन का विस्तार ले लो


विनोद तिवारी की कविता "प्यार का उपहार" का वीडियो। उपहार उनका और वीडियो द्वारा उपहार का सम्प्रेषण भी वह ही कर रहे हैं। सरल श्रृंगार रस और अभिसार में भीगा, फिर भी प्यार का उपहार ऐसा जो व्यापक होने को प्रेरित करे।

प्यार का उपहार
इस महीने :
'अधूरी साधना'
वाणी मुरारका


प्रियतम मेरे,
सब भिन्न भिन्न बुनते हैं
गुलदस्तों को,
भावनाओं से,
विचारों से।
मैं तुम्हे बुनूँ
अपनी साँसों से।
भावनायें स्थिर हो जाएँ,
विचारधारा भी
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'प्रेम अक्षत'
आभा सक्सेना


आप सुन तो रहें हैं
मेरे गीत यह
मन के मन्दिर में दीपक
जलाये तो हैं
आपके सामने बैठ कर
अनगिनत, अश्रु पावन
नयन से गिराये तो हैं
नेह की डालियों से
सुगन्धित सुमन
सांवरे श्री चरण पर
चढ़ाये तो हैं
..

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