शीत का आतंक
कटकटाती शीत में
सूर्य के सामने ही
आज फिर से
कल की तरह
पारदर्शी हिम पर्त
मेरे हृदय पर पड़ गई
और मेरे ज्ञान का सूर्य
देखने भर को विवश था।

कर भी सकता क्या भला
परतें पड़ीं जिसके ह्रदय पर
हाथ ठिठुरे
पैर ठिठुरे
आंसुओं पर भी लगा गंभीर पहरा
और मेरी इस बेबसी पर
हँस रहा था कोहरा
हो कर के दोहरा
- लक्ष्मी नारायण गुप्त

काव्यालय को प्राप्त: 10 Jan 2020. काव्यालय पर प्रकाशित: 27 Nov 2020

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इस महीने :
'एक कवि का अंतर्द्वंद्व'
विनय सौरभ


वह बहुत उदास-सी शाम थी
जब मैं उस स्त्री से मिला

मैंने कहा - मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
फिर सोचा - यह कहना कितना नाकाफ़ी है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'वो हवा वहीं ठहरी है'
प्रकाश देवकुलिश


वो हवा वहीं ठहरी है अभी तक
और छूती है रोज
लगभग रोक लेती हुई सी
जब गुजरने लगता हूँ वहाँ से
जहाँ उस दिन गुजरते फोन आ गया था तुम्हारा
और थोड़ी देर के लिए आस पास
चम्पा के फूल खिल आये थे
..

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इस महीने :
'तेरी हँसी कृष्ण विवर सी'
पूनम सिन्हा


छोटी सी दुनिया
कितने सारे लोग
रज तम सत का
विभिन्न संयोग।
सहूलियत के हिसाब से
बाँट लिया,
कितने नामों से
पुकार लिया,
मान्यताओं और परम्पराओं में
जकड़ लिया
... ..

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