प्रेम
किसी चट्टान की
खुरदुरी सतह पर उभरी
किसी दरार पर
हौले से अपना हाथ यूँ रखो
मानो पूछ रहे हो
उससे उसकी खैरियत।
तुम देखना
कुछ समय बाद
वहाँ कोई कोंपल फूट गई होगी
अथवा
उस दरार में
पानी के निशान होंगे।
- सुरेश बरनवाल
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काव्यालय को प्राप्त: 18 Jun 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 26 Jul 2019

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इस महीने :
'हिन्दोस्तां हमारा'
विनोद तिवारी


एक मस्जिद को तोड़ कर मानो एक मन्दिर बना लिया हमने।
इससे कितनों को मिल गई रोटी, किस समस्या को हल किया हमने।

बात मेरी नहीं है उसकी है, जिसका इनसानियत से रिश्ता था ।
एक गांधी था जो महात्मा था, जो कि सच्चाई का फरिश्ता था ।

सिर्फ इनसानियत एक मज़हब है, एक ही है खुदा सबका ।
एक ही ज़मीन है सबकी, एक ही आसमान है सबका ।

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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'सत्यं शिवं सुन्दरम्'
सुधीर कुमार शर्मा


वसुधा के कण-कण तृण-तृण में
सूरज चंदा नीलगगन में
नदिया पर्वत और पवन में
कोटि-कोटि जन के तन-मन में
सिमटी उस विराट शक्ति को
मन-मंदिर में सदा बसाओ
शिव से ही कुछ सुन्दर उपजाओ
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शुक्रवार 20 दिसम्बर को

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