अप्रतिम कविताएँ
प्रवाह
बनकर नदी जब बहा करूंगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
अपनी आँखों से कहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
हर कथा रचोगे एक सीमा तक
बनाओगे पात्र नचाओगे मुझे
मेरी कतार काटकर तुम
एक भीड़ का हिस्सा बनाओगे मुझे
मेरी उड़ान को व्यर्थ बता
हंसोगे मुझपर, टोकोगे मुझे
एक तस्वीर बता, दीवार पर चिपकाओगे मुझे।
पर जब ...
अपने ही जीवन से कुछ पल चुराकर
मैं चुपके से जी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
तुम्हे सोता देख,
मैं अपने सपने सी लूँ!
अपनी कविता के कान भरूंगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
जितना सको प्रयास कर लो इसे रोकने की,
इसके प्रवाह का अन्दाज़ा तो मुझे भी नहीं अभी!
- अजंता शर्मा
Ajanta Sharma
email: [email protected]
Ajanta Sharma
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विषय:
संकल्प (16)
स्त्री (19)
रिश्ते (18)

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..

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नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
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हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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