नचारी को, मुक्तक काव्य के अन्तर्गत लोक-काव्य की श्रेणी में परिगणित किया जा सकता है। इसकी रचना में लोक-भाषा का प्रयोग और शैली में विनोद एवं व्यंजना पूर्ण उक्तियाँ रस को विलक्षण स्वरूप प्रदान कर मन का रंजन करती हैं। इनका लिखित स्वरूप सर्व प्रथम 'विद्यपति की पदावली' की पदावली में प्राप्त होता है। आराध्य के प्रति विनोद और व्यंग्य से पूर्ण, इन पदों में मुझे विलक्षण रस की अनुभूति हुई। इन 'नचारियों' के मूल में वही प्रेरणा रही है। |
नचारी
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प्रतिभा सक्सेना
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'लेखक' आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़। क़लम की नोक ही बनती है कुदाल, हँसिया और हल। हल, जो यादों को कुरेदते हुए अतीत को खरोंचते हुए .. पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'गुनाह का गीत' धर्मवीर भारती
अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो? महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो? तुम्हारा मन अगर सींचूँ गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से! तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से कली-सा तन, किरन-सा .. पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों' शान्ति मेहरोत्रा
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
मधुमय प्रभात की बेला में, रवि ने संध्या का किया मोल; तब कमल दलों ने भंवरों को, निज बन्दीगृह से दिया खोल; तो भी मेरे भोले बन्दी! तुम भी निज को आजाद करो; फिर साहस लेकर एक बार, सूनी कुटिया आबाद करो! मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों? .. पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
भावुकता और पवित्रता
भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा... पूरे आलेख को इस लिंक पर पढ़ें -
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