अप्रतिम कविताएँ
मेरी ज़िद
तेरी कोशिश, चुप हो जाना,
मेरी ज़िद है, शंख बजाना ...

                   ये जो सोये, उनकी नीदें
                   सीमा से भी ज्यादा गहरी
                   अब तक जाग नहीं पाये वे
                   सर तक है आ गई दुपहरी;
                   कब से उन्हें, पुकार रहा हूँ
                   तुम भी कुछ, आवाज़ मिलाना...

तट की घेराबंदी करके
बैठे हैं सारे के सारे,
कोई मछली छूट न जाये
इसी दाँव में हैं मछुआरे.....
मैं उनको ललकार रहा हूँ,
तुम जल्दी से जाल हटाना.....

                   ये जो गलत दिशा अनुगामी
                   दौड़ रहे हैं, अंधी दौड़ें,
                   अच्छा हो कि हिम्मत करके
                   हम इनकी हठधर्मी तोड़ें.....
                   मैं आगे से रोक रहा हूँ -
                   तुम पीछे से हाँक लगाना ....
- कृष्ण वक्षी
Poet's Address: Saket, Ganj Basauda (M.P.)
Ref: Naye Purane, April 1998
विषय:
संकल्प (15)
समाज (33)

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इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'देश की नागरिक'
वाणी मुरारका


आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
क्या गढ़ूँगी?
कौन से देश की नागरिक बनूँगी?
सवाल खुद से करती हूँ|
..

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इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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