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इस महीने
'एक फूल की चाह'
सियाराम शरण गुप्त


बेटी, जाता हूँ मन्दिर में
आज्ञा यही समझ तेरी।
उसने नहीं कहा कुछ, मैं ही
बोल उठा तब धीरज धर -
तुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल तो दूँ लाकर! ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'कविता उम्मीद से है'
पारुल 'पंखुरी'


क़लम, लिखना चाहती है 'बच्चियां'
कविता खिलखिलाना चाहती है
मासूम चीखों का शोर
मचा देता है उथल पुथल
काँपने लगता है क़लम का तन बदन
कविता रोने लग जाती है ...
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 26 अक्टूबर को

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