अप्रतिम कविताएँ
यह कैसी दुर्धर्ष चेतना
यह कैसी दुर्धर्ष चेतना, प्रतिपल बढ़ती ही रहती है
चिंतन के उत्तुंग शिखर पर, गिर-गिर चढ़ती ही रहती है

पग-पग पर ठोकर लगने से, नए-नए अनुभव जगते हैं
बहते हुए घाव लोहू की, लौ जैसे जलते लगते हैं
और उसी के लाल उजाले में विचार चलता रहता है
धीरे-धीरे जैसे अपनी केन नदी में जल बहता है

मन के भीतर नए सूर्य की, प्रतिमा गढ़ती ही रहती है
यह कैसी दुर्धर्ष चेतना, प्रतिपल बढ़ती ही रहती है

यह विचार परिवर्तनधर्मी होकर दाय नया गहता है
जय के प्रति विश्वास लिए, युग की सर्दी-गर्मी सहता है
बीते हुए समय के तेवर फिर-फिर रोज़ उलझते रहते
पीड़ा की किरणों से इसके, सारे द्वंद्व सुलझते रहते

नभ पर लिखे हुए भावी के अक्षर पढ़ती ही रहती है
कैसी यह दुर्धर्ष चेतना, प्रतिपल बढ़ती ही रहती है
- कृष्ण मुरारी पहारिया
दुर्धर्ष : प्रबल, जिसे वश में करना कठिन है | केन नदी : मध्यप्रदेश में बहने वाली एक बड़ी नदी
विषय:
अध्यात्म दर्शन (37)

काव्यालय पर प्रकाशित: 31 May 2024

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देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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