देख यायावर!
तुझे दरिया बुलाते हैं,
बूँदों के हार लेकर।
तुझे अडिग पर्वत बुलाते हैं,
हिम कणों का भार लेकर।
देख यायावर! तू ठहरना नहीं,
जब तलक वादियाँ मिल जाए न।
देख यायावर! तू ठहरना नहीं,
जब तलक आँखें अनिमेष ठहर जाए न।
देख छूती नभ में जलद को,
देवदारु की पंक्तियाँ।
देख होती घाटियों में परिवर्तित,
इन श्रृंखलाओं की विभक्तियाँ।
हो रही है निछावर,
जहाँ प्रकृति जी जान से।
तृप्त हो जाता है हृदय,
सुन निर्झर की मधु तान से।
देख यायावर! ये वही महान् हैं,
हिमालय की ये श्रृंखलाएँ,
विश्व में बढा़ती शान हैं।

देख यायावर! ये दनुज सी लहरें,
जाने तुझसे क्या कह रहीं।
अथाह जलराशि इन दरियाओं में,
चिरकाल से है बह रहीं।
है समेटे हुए एक पूरा ही विश्व,
यह अपने आप में।
रहस्यों की विविध गर्तें,
ले रहा है अपने साथ में।
बैठकर इसके तट पर हे यायावर!
करना मनन उस रचनाकार का।
किया अद्भुत ये ब्रह्मांड साकार,
धन्यवाद देना उस निराकार का।
- सोनू हंस
यायावर: अश्वमेध का घोड़ा, खानाबदोश, nomad; अनिमेष: अपलक; जलद: बादल; दनुज: दानव
Email: [email protected]

प्राप्त: 1 Jul 2017. प्रकाशित: 3 Aug 2017

***
इस महीने
'एक फूल की चाह'
सियाराम शरण गुप्त


बेटी, जाता हूँ मन्दिर में
आज्ञा यही समझ तेरी।
उसने नहीं कहा कुछ, मैं ही
बोल उठा तब धीरज धर -
तुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल तो दूँ लाकर! ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने
'कविता उम्मीद से है'
पारुल 'पंखुरी'


क़लम, लिखना चाहती है 'बच्चियां'
कविता खिलखिलाना चाहती है
मासूम चीखों का शोर
मचा देता है उथल पुथल
काँपने लगता है क़लम का तन बदन
कविता रोने लग जाती है ...
..

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शुक्रवार 26 अक्टूबर को

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