अप्रतिम कविताएँ पाने
बूँदें
बरसती हैं बूँदें
झूमते हैं पत्ते

पत्ता-पत्ता जी रहा है
पल पल को

आने वाले कल से बेख़बर
- कुसुम जैन

काव्यालय को प्राप्त: 26 Sep 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 1 Oct 2021

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इस महीने :
'धूप का टुकड़ा'
ममता शर्मा


सुनो!
आज पूरे दिन मैं भागता रहा
धूप के एक टुकड़े के पीछे,
सुबह सवेरे खिड़की से झाँक रहा था
तो मैं उसे पकड़ कर बैठ गया

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इस महीने :
'कच्ची-कच्ची धूप'
कल्पना मनोरमा


सरसों के दामन से लिपटी
मन से कच्ची-कच्ची धूप ।।

बूढ़ा जाड़ा मोहपाश में
दिन को जकड़े रहता
काँख गुदगुदी करता सूरज
दिन किलकारी भरता

कभी फिसलती कभी सम्हलती
करती माथा-पच्ची धूप ।।
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इस महीने :
'नया वर्ष'
अज्ञात


नए वर्ष में नई पहल हो
कठिन ज़िंदगी और सरल हो
अनसुलझी जो रही पहेली
अब शायद उसका भी हल हो
... ..

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