विसंगतियां
जब भी मुझे
जंजीरों का अहसास
कुछ ज्यादा हुआ है
कुछ कर गुज़रने की ललक
मुझमें बढ़ी है
सीमाएं तोड़ जाने की शक्ति
मेरे बंधे हाथों ने दी है
पैरों की बेड़ियों ने
गगनचुम्बी हौसले दिए हैं
सच कहूँ ठोकरों ने मेरी ज़िन्दगी
गतिशील ही की है
जब भी दोस्तों ने मेरे
अस्तित्व को नकारना चाहा
मुझे अपनी ही पहचान मिली है ।
- कान्ता गोगिया
Kanta Gogia
Email: kanta_cis@yahoo.co.in
Kanta Gogia
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इस महीने की कविता
'एक रहस्य'
अनीता निहलानी


कोई करे भी तो क्या करे
इस अखंड आयोजन को देखकर
ठगा सा रह जाता है मन का हिरण
इधर-उधर कुलांचे मारना भूल
निहारता है अदृश्य से आती स्वर्ण रश्मियों को ...
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इस महीने की कविता
'मेरे मधुवन'
विनोद तिवारी


दूर क्षितिज के पीछे से फिर
तुमने मुझको आज पुकारा।
तुमको खो कर भी मैंने
सँजो रखा है प्यार तुम्हारा।

एक सफेद रात की छाया
अंकित है स्मृति में मेरी।
तारों का सिंगार सजाए,
मधुऋतु थी बाहों में मेरी। ...
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