तुम
एक ख़्वाब की नदी सी
मुझमें जो बहती हो

अलसाए दिन ढ़ोते हैं
उनींदी रातों को

मैं जानता नहीं ये क्या है
मैं सोचता नहीं ये क्यों है

हर बार तुम्हे मिटाता हूँ
हर बार तुम बन जाती हो

एक ख़्वाब की नदी सी ...
- जितेन्द्र दवे
Jitendra Dave
email: jitdave@rediffmail.com
Jitendra Dave
email: jitdave@rediffmail.com

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काव्यालय की विशेष प्रस्तुति
इस महीने की कविता
किसी के सान्निध्य का ऐसा असर!
'तुम्हारे साथ रहकर'
सर्वेश्वरदयाल सकसेना


तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएँ पास आ गयी हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है ...
पूरी रचना यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने की कविता
दाम्पत्य जीवन में अहं के टकरार के बाद -
'पुनर्मिलन'
राजेश कुमार दूबे


फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ
इस बहाने दंभ के उस आवरण को भी हटा लूँ

दंश दे जो जिंदगी को वह कहानी हम भुला दें
आपसी मनभेद की अंतर्व्यथा को हम सुला दें
नेह के नवपुष्प का नव अंकुरण फिर से करा लूँ
फिर तुम्हारे अंक में नव प्रीत के दो पल बिता लूँ ...
पूरी रचना यहाँ पढें...