पेड़, मैं और सब
पेड़ नहीं हैं, उठी हुई
धरती की बाहें हैं
तेरे मेरे लिए माँगती
रोज दुआएँ हैं।
         पेड़ नहीं हैं ये धरती की
         खुली निगाहें हैं
         तेरे मेरे लिए निरापद
         करती राहे हैं।
पेड़ नहीं ये पनपी धरती
गाहे गाहे हैं
तेरे मेरे जी लेने की
विविध विधाएँ हैं।
         पेड़ नहीं ये धरती ने
         यत्न जुटाए हैं
         तेरे मेरे लिऐ खुशी के
         रत्न लुटाये हैं।
पेड़ नहीं ये धरती ने
चित्र बनाए हैं
तेरे मेरे लिए अनेकों
मित्र जुटाए हैं।
         पेड़ नहीं ये धरती ने
         चँवर डुलाए हैं।
         तेरे मेरे लिऐ छाँह के
         गगन छवाए हैं।
पेड़ नहीं ये धरती ने
अलख जगाए हैं
तेरे मेरे 'ढूँढ' के
जतन जताए हैं।
         पेड़ नहीं है अस्तित्वों के
         बीज बिजाए हैं
         तेरे मेरे जीने के
         विश्वास जुड़ाए हैं।
- मरुधर मृदुल
Poet's Address: Ganeshlal Ustad Marg,
71, Nehru Park, Jodhpur-342003
Ref: Naye Purane, 1999

English translation of this poem by Vani Murarka: "Trees, me and everyone"

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इस महीने
'गा रही मैं गीत में तूफ़ान'
सूर्यकुमारी माहेश्वरी


गा रही मैं गीत में तूफ़ान!

आज जबकि सप्त सागर खौलते हैं
आज जबकि प्रलय के स्वर गूंजते हैं
आज घिरता आ रहा जब विश्व का अवसान
गा रही मैं गीत में तूफ़ान!
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इस महीने
'यह अमरता नापते पद - महादेवी वर्मा को श्रद्धांजलि'
शरद तिवारी



बात उन दिनों की है जब मैं क्रोस्थवेट कॉलेज, इलाहाबाद में ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। भारत की स्वतंत्रता को भी अभी 11 - 12 वर्ष ही हुए थे। उन दिनों इलाहाबाद हिन्दी साहित्य का गढ़ माना जाता था। हिन्दी के कई दिग्गज साहित्यकार इलाहाबाद के निवासी थे। इनमें से तीन प्रमुख नाम थे निराला, सुमित्रानंदन पंत, और महादेवी वर्मा, जिन्हे हिन्दी में छायावाद का अग्रदूत कहा जाता है। इन तीनो में मेरे लिए और मेरी सहपाठी सखियों के लिए महादेवी वर्मा का विशेष भावनात्मक महत्त्व था, क्योंकि वह भी हमारे क्रोस्थवेट कॉलेज में ही प्रशिक्षित हुयी थीं। ..
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शुक्रवार 7 सितम्बर को

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