मेरी ज़िद
तेरी कोशिश, चुप हो जाना,
मेरी ज़िद है, शंख बजाना ...

                   ये जो सोये, उनकी नीदें
                   सीमा से भी ज्यादा गहरी
                   अब तक जाग नहीं पाये वे
                   सर तक है आ गई दुपहरी;
                   कब से उन्हें, पुकार रहा हूँ
                   तुम भी कुछ, आवाज़ मिलाना...

तट की घेराबंदी करके
बैठे हैं सारे के सारे,
कोई मछली छूट न जाये
इसी दाँव में हैं मछुआरे.....
मैं उनको ललकार रहा हूँ,
तुम जल्दी से जाल हटाना.....

                   ये जो गलत दिशा अनुगामी
                   दौड़ रहे हैं, अंधी दौड़ें,
                   अच्छा हो कि हिम्मत करके
                   हम इनकी हठधर्मी तोड़ें.....
                   मैं आगे से रोक रहा हूँ -
                   तुम पीछे से हाँक लगाना ....
- कृष्ण वक्षी
Poet's Address: Saket, Ganj Basauda (M.P.)
Ref: Naye Purane, April 1998

***
इस महीने
'मेरे सम्बन्धीजन'
परमहंस योगानन्द


समाधि के विस्तृत महाकक्ष में,
जो लाखों झिलमिलाते प्रकाशों से दीप्त,
और बर्फीले बादल की चित्र यवनिका से शोभायमान है,
मैंने गुप्त रूप से अपने सभी - दीन-हीन, गर्वित सम्बन्धीजनों को देखा।

महान प्रीतिभोज संगीत से उमड़ा,
ओम का नगाड़ा बजा अपनी ताल में।
अतिथि नाना प्रकार के सजे,
कुछ साधारण, कुछ शानदार पोशाकों में। ..
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शुक्रवार 20 जुलाई को

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